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मेरी रचना उत्तराखंड से प्रकाशित प्रेरणा अंशु मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुई।
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जिसकी मुरली की तान ने जग को मोहित कर लिया,जो सर्वव्यापी सत्य है,आज भी गोकुल मथुरा में अपने होने का अहसास करवाते हैं, जो पल पल अपने भक्तों की रक्षा करते हैं,जो पालनहार,सृष्टि रचेता भी हैं ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी भगवत श्री कृष्ण को बारम्बार प्रणाम। सदैव हम सब पर कृपा बनाये रखे। अपनी शीतलता की छाँव हमें देते रहे।
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मेरी कहानी शब्द गंगा पत्रिका में 
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मेरी लघुकथा शाश्वत सृजन पत्र उज्जैन में 
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प्रथम बालिका के जन्म के बाद हृदय में व्याप्त अनुभूतियों ने काव्य का रूप धारण कर लिया - हेलि मेरी प्यारी बिटिया सुमधुर इसका नाम है, इसके आ जाने से मुझको लगता स्वर्ग जहान है सूरज सी मुस्कान लिये वह और चंदा सी चंचल है उसकी पायल की छन छन से गूंजे सारा अंचल है। चिड़ियों सी चहकती है वह मीठी लगती तान है सुनकर इसकी प्यारी बोली खिलते तन मन प्राण है। दादाजी की राज दुलारी दादी की प्यारी पोती है पापा की है रानी बेटी मम्मी के आँचल सोती है। नानाजी की बड़ी लाडली नानी के मन को भाती है मामाजी की प्रिय भांजी मामी को नखरे दिखाती है। तनवी उसकी प्यारी दीदी दीदी को भी सबसे प्यारी है हर बच्चे की दोस्त बनी वह पर डॉल सहेली न्यारी है। प्रथम वर्ष गाँठ पर तुमको देंगे हम आशीष नवल इस जीवन के हर पथ पर भविष्य तुम्हारा हो उज्जवल नाम जहाँ में रोशन करना हम सबका ये अरमान है भरा रहे खुशियों से दामन देंगे देव यही वरदान है हेलि मेरी प्यारी बिटिया सुमधुर इसका नाम है इसके आ जाने से मुझको लगता स्वर्ग जहान है...... डॉ.रुपाली भारद्वाज
मुझे रात में कई दिनों से बड़े बुरे सपने आ रहे थे। कभी बहुत से लोग सपने में दिखते थे ,कभी समारोह परिदृश्य दिखाई देता था।क पूर्वज भी कई बार मेरे सपनों में आते थे और कई बार डरावने सपने दिखते थे जिससे मैं बहुत डर जाती थी,रेल परिदृश्य भी मेरे सपनों का हिस्सा थे। मेरे मन में कई प्रश्न उठ रहे थे जिनके जवाब  में ढूँढ रही थी पर वास्तविकता के धरातल पर उनके जवाब मुझे नहीं मिले। सपनों का क्रम लगातर मुझे उद्वेलित कर रहा था। कई बार देर रात तक नींद भी नहीं आती थी और नींद आने पर फ़िर वही डरावने सपने। इन सपनों का मेरे वर्तमान जीवन से सम्बन्ध गहरा  था,बस मुझे यही समझ आ रहा था पर स्पष्ट कारण से मैं अनभिज्ञ थी। इसी दरमियान मेरा मायके जाने का हुआ पहले से  कोई निश्चित नहीं था,अचानक गयी तो सभी के चेहरे पर मुस्कान की लहरें दौड़ गयी,खास तौर पर मेरे पापा के  चेहरे पर मुस्कान  मेरे आने से ही आ गयी। हम बैठे कुछ बातें हुई जो बहुत दिनों से पापा के शांत व्यवहार की वजह से हो नहीं पा रही थी। इसी बीच सपनों का वही क्रम मुझे उलझा लेता। नित्य ही मेरे पापा सुबह सैर पर जाने लगे थे थोड़े दिन पहले ही उ...
हँसते रहो हँसते रहो,मुस्कुराते रहो, जिंदगी का लुत्फ उठाते रहो, क्या रखा है  शिकवा और शिकायत में दोस्तों, बनकर पंछी उन्मुक्त गगन में, हँसते रहो.... अपने पंख पसारते रहो। न फ़िर ये सुबह आयेगी, न निशा फ़िर जलवे दिखायेगी, छोड़ दो पुरानी रंजिशे, नव किरण दिल में जगाते रहो हँसते रहो.. न हम होंगे न तुम होगे, जीवन परिदृश्य भी बदले होंगे, भूलकर सारी उलझने, बसंत बनकर गुन गुनाया करो, हँसते रहो... डॉ.रुपाली भारद्वाज स्वरचित फरवरी इवेंट 2017 प्रतिलिपि डॉट कॉम 
सांसों का ताना बाना अरमानों की इस बस्ती में सांसों का ताना बाना है, आज यही रुकना है पगले कल फ़िर बस उड़ जाना है। पल भर का है ये झमेला खुशबू का कहाँ ठिकाना है, चौराहे के बीच खड़े सब मंजिल तक आना जाना है। गर इतनी बात समझ जाते, न कोई चरित्रहीन बन पाते, नियम, संयम, निष्ठा से, जीवन अपना वे जी पाते। चरित्रहीन व्यक्ति का देखो, न कोई ठिकाना है, आज यही रुकना है पगले कल फ़िर बस उड़ जाना है। ये है निर्विकार,अमृत वाणी, एक दिन ये दुनिया सबको छोड़ के जानी, आस, ईर्ष्या ,झूठ,कपट, तज, गुल बहार, रसदार बनानी। अपने जीवन का देखो ये तो रैन बसेरा है, आज यही रुकना है पगले कल फ़िर बस उड़ जाना है। डॉ.रुपाली भारद्वाज स्व रचित (प्रतिलिपि डॉट कॉम  में फरवरी इवेंट में प्रकाशित)
मेरी लघु कथा जिसे हस्ताक्षर वेब पत्रिका(प्रीति अज्ञात जी के सम्पादन में)  मार्च 2017 में स्थान मिला। देह रोज़ सुबह की तरह मेहता जी आज भी सैर पर जाने को तैयार थे। अभी थोड़े ही दिनों पहले डॉक्टर ने उनकी शुगर के बारे में उनको बताया, तभी से वो रोज़ सैर पर जाने लगे थे। सीधे सरल व्यक्तित्व के मेहता जी सभी के भले के लिये तत्पर रहते। घर से कुछ ही दूरी पर उनके पैर लड़खड़ाये,उन्होंने अपने आप को सम्भला   कुछ दूर आगे जाने पर एक जोरदार झटके ने उनके प्राणों को हर लिया। एकदम मृत्यु से साक्षात्कार हो जायेगा किसी ने नहीं सोचा था, स्वयं मेहता जी भी अचरज में थे। सफेद वस्त्र से लिपटा हुआ शरीर,रोते बिलखते परिजन सब नेत्रों के सामने था दूर हुए थे तो बस ये ही।मेहताजी अपनी  बेटी से बात करना चाह रहे,अपने शरीर में जाना चाह रहे थे  पर कुछ भी प्रतिक्रया व्यक्त करने में  असमर्थ थे। कुछ बातें जो वो करना चाहते थे,कुछ ऐसे काम जो पूरे नहीं हो सके उनको अंजाम तक भी पहुँचाना चाहते थे। स्वयं की देह के समक्ष मेहताजी  को अजनबी के समान अनुभूति ने घेर लिया सोचने लगे जिस तन के सहारे मैंने अपने ...
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मेरी लघु कथा जिसे हस्ताक्षर वेब (संपादिका प्रीति अज्ञात )पत्रिका मार्च 2017 में स्थान मिला। प्राकृतिक अनुराग झरने के किनारे बैठी  शुभि  आसमानों में बन रही आकृति को निहार रही थी। प्रकृति से प्रेम उसका बचपन से ही रहा है। उड़ते हुए परिंदे ,गाती हुई नदियाँ,बहते हुए झरने,पर्वत,बादल मानो उसका परिवार हो। ओ मेडम-पीछे से राजीव का स्वर कहाँ खोई हो, चलो मुझे तुमसे  ज़रूरी कुछ बात करनी है। क्या बात है-शुभि  ने कहा मेरे पापा का ट्रांसफर दिल्ली हो गया,हम वही शिफ्ट होने वाले है तुम बोलो तो शादी की बात करूँ तुम भी हमारे साथ चलना।   राजीव ने कहा । नहीं राजीव -मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकती।तुम अपने भविष्य पर ध्यान दो मेरे लिये तो उत्तरांचल की ये वादियाँ ही सब कुछ है। जितनी करीब मैं इनकी हूँ उतना तो  शायद किसी के  भी नहीं हो सकती। तुमने शायद मेरी दोस्ती को प्यार समझ लिया।इन वादियों में एक गहरी अनुभूति छिपी है जिसे शायद तुम नहीं  समझ सकते। तुम शायद इसे निर्जीव वस्तु मानते हो,पर इनके गहरे रंगों को मैंने पहचाना है,ये रंग ही  तो आंतरिक अनुभूति जगाते है। ...
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नारी हूँ नारीत्व बचाना है, खोये हुए अस्तित्व को फ़िर जगाना है। है मुश्किल मंज़िल मगर , हौंसले को फ़िर बुलंद बनाना है। डॉ.रुपाली भारद्वाज
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बिखरते रिश्ते जज्बात कई दिल में छिपाये रहते हैं लोग, अपनों को ही गैरों के लिये छोड़ देते हैं लोग। थामा था दामन क्यूँ पल भर के लिये, क्यूँ दी खुशी पलक झपकाने तक भूल के सारी रस्म और  हया गैरों का दामन थाम लेते हैं लोग। आँसुओं की कोई कद्र नहीं करते, बीते सुनहरे पल वो याद नहीं करते डुबोकर अपनी ही किश्ती को, सवार औरों की किश्ती पर हो जाते हैं लोग। डॉ.रुपाली भारद्वाज
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सपन सजीला जीवन  जीवन जैसे खुशियों का  मेला, सुंदर सुंदर सपन सजीला। हर पल लगता खुशियों का डेरा, मंद मंद कोई हवा के जैसा। बादलों ने एक चित्र उकेरा, देखन को मन हुआ बावरा। निंद्रा से जागी तो हुआ सवेरा, कलरव की सुरमई तान ने घेरा। पनघट,पंछी,बादल जैसा, जीवन जैसे....... प्रभात की निकली शुभ बेला, स्वर्ण कणों ने डाला डेरा, पुष्पों पर मंडराता भंवरा, उनके मकरंद पर आकर ठहरा। दिन,दिनकर दिलदार के जैसा, जीवन जैसे........ डॉ.रुपाली भारद्वाज  स्वरचित
बार्बी और बस्ती माँ इस गली से नहीं गुजरा करो,मुझे ये छोटी सी बस्ती वाले रास्ते से गुजरना पसंद नहीं....कहते हुए बार्बी ने मुँह बनाया। माँ अक्सर टू व्हीलर  से उस रास्ते से निकला करती  थी। माँ ने बार्बी को समझाया- हमें इन लोगों से घृणा नहीं करनी चाहिये। ये लोग हमारे रोज़ मर्रा के कई कामों को अंजाम देते हैं  हमें इनके प्रति कम से कम सुहानुभूति का भाव रखना चाहिये। ऐसा  कहते ही अचानक गाड़ी के जोर से ब्रेक लगते है और बार्बी नीचे गिर जाती है वैसे चोट ज्यादा नहीं थी। घटना को देख कर आसपास के लोग इकठ्ठा हो जाते है बार्बी अपने आप में कुछ  खो जाती है। माँ गाड़ी आगे बढ़ाते हुए बोली -देखा बार्बी , जहां बड़ी कॉलोनी में लोगों के चेहरे ही दिखाई नहीं देते और किसी का किसी से कोई वास्ता नहीं होता वही ये लोग मदद  के लिये तत्पर होते है। अब बार्बी को ये बात अंदर तक समझ आ  रही थी। डॉ.रुपाली भारद्वाज 
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शिव आराध्य,देवों के देव फ़िर कैसे उन्हें मनाऊँ मैं पूजन,अर्चन,धूप,दीप करूँ फ़िर कैसे उन्हें रिझाऊ मैं बन जाऊँ गर गँगा मैया, अर्पण कर दूँ बन,जल की धार है सहज नहीं पर गंगा बनना, फ़िर कैसे उन्हें रिझाऊ मैं। बन जाऊँ गर गौरा मैया नित अर्पण कर दूँ जीवन पतवार है सहज नहीं पर गौरा बनना, फ़िर कैसे उन्हें रिझाऊ मैं। डॉ.रुपाली भरद्वाज

दीपक

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कभी दीपक बनूं, कभी बाती बनूं पर किसी की राह का काँटा न बनूं। जलाऊ प्यार की ज्योति दिल में, कभी दिलों को जलाने वाली आग न बनूं। दिखाऊ रास्ता सदा प्यार का, कभी दिल को दुखाने का कारण न बनूं। मिटाऊं आपसी बैर बीच का, कभी दुश्मनी का आगाज न  बनूं डॉ.रुपाली भारद्वाज

होली के रंग

ये मतवाले होली के रंग, खेले राधे कृष्ण के संग। प्रीत का रंग हुआ और गहरा, चारों तरफ़ गोपियों का पहरा। राधे बोली खेलत होली, मन को विचलित करती ये टोली। कृष्ण मंद मंद मुसकाये, गालों पर फ़िर रंग लगाये। शर्म हया से चमके गाल, होली ने तो किया कमाल। डॉ.रुपाली भारद्वाज