सांसों का ताना बाना अरमानों की इस बस्ती में सांसों का ताना बाना है, आज यही रुकना है पगले कल फ़िर बस उड़ जाना है। पल भर का है ये झमेला खुशबू का कहाँ ठिकाना है, चौराहे के बीच खड़े सब मंजिल तक आना जाना है। गर इतनी बात समझ जाते, न कोई चरित्रहीन बन पाते, नियम, संयम, निष्ठा से, जीवन अपना वे जी पाते। चरित्रहीन व्यक्ति का देखो, न कोई ठिकाना है, आज यही रुकना है पगले कल फ़िर बस उड़ जाना है। ये है निर्विकार,अमृत वाणी, एक दिन ये दुनिया सबको छोड़ के जानी, आस, ईर्ष्या ,झूठ,कपट, तज, गुल बहार, रसदार बनानी। अपने जीवन का देखो ये तो रैन बसेरा है, आज यही रुकना है पगले कल फ़िर बस उड़ जाना है। डॉ.रुपाली भारद्वाज स्व रचित (प्रतिलिपि डॉट कॉम में फरवरी इवेंट में प्रकाशित)