हँसते रहो


हँसते रहो,मुस्कुराते रहो,
जिंदगी का लुत्फ उठाते रहो,
क्या रखा है  शिकवा और शिकायत में दोस्तों,
बनकर पंछी उन्मुक्त गगन में,

हँसते रहो....


अपने पंख पसारते रहो।
न फ़िर ये सुबह आयेगी,
न निशा फ़िर जलवे दिखायेगी,
छोड़ दो पुरानी रंजिशे,
नव किरण दिल में जगाते रहो

हँसते रहो..


न हम होंगे न तुम होगे,
जीवन परिदृश्य भी बदले होंगे,
भूलकर सारी उलझने,
बसंत बनकर गुन गुनाया करो,


हँसते रहो...


डॉ.रुपाली भारद्वाज
स्वरचित
फरवरी इवेंट 2017 प्रतिलिपि डॉट कॉम 

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