मेरी लघु कथा जिसे हस्ताक्षर वेब (संपादिका प्रीति अज्ञात )पत्रिका मार्च 2017 में स्थान मिला।

प्राकृतिक अनुराग

झरने के किनारे बैठी  शुभि  आसमानों में बन रही आकृति को निहार रही थी। प्रकृति से प्रेम उसका बचपन से ही रहा है। उड़ते हुए परिंदे ,गाती हुई नदियाँ,बहते हुए
झरने,पर्वत,बादल मानो उसका परिवार हो।
ओ मेडम-पीछे से राजीव का स्वर
कहाँ खोई हो, चलो मुझे तुमसे  ज़रूरी कुछ बात करनी है।
क्या बात है-शुभि  ने कहा
मेरे पापा का ट्रांसफर दिल्ली हो गया,हम वही शिफ्ट होने वाले है तुम बोलो तो शादी की बात करूँ तुम भी हमारे साथ चलना।   राजीव ने कहा ।
नहीं राजीव -मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकती।तुम अपने भविष्य पर ध्यान दो मेरे लिये तो उत्तरांचल की ये वादियाँ ही सब कुछ है। जितनी करीब मैं इनकी हूँ उतना तो  शायद किसी के  भी नहीं हो सकती। तुमने शायद मेरी दोस्ती को प्यार समझ लिया।इन वादियों में एक गहरी अनुभूति छिपी है जिसे शायद तुम नहीं  समझ सकते। तुम शायद इसे निर्जीव वस्तु मानते हो,पर इनके गहरे रंगों को मैंने पहचाना है,ये रंग ही  तो आंतरिक अनुभूति जगाते है।
शुभि एक शांत सागर सी  दिखाई दे रही थी और  राजीव अपलक उसे निहार रहा था।
डॉ.रुपाली भारद्वाज

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