सपन सजीला जीवन 

जीवन जैसे खुशियों का  मेला,
सुंदर सुंदर सपन सजीला।
हर पल लगता खुशियों का डेरा,
मंद मंद कोई हवा के जैसा।

बादलों ने एक चित्र उकेरा,
देखन को मन हुआ बावरा।
निंद्रा से जागी तो हुआ सवेरा,
कलरव की सुरमई तान ने घेरा।

पनघट,पंछी,बादल जैसा,
जीवन जैसे.......

प्रभात की निकली शुभ बेला,
स्वर्ण कणों ने डाला डेरा,
पुष्पों पर मंडराता भंवरा,
उनके मकरंद पर आकर ठहरा।

दिन,दिनकर दिलदार के जैसा,
जीवन जैसे........

डॉ.रुपाली भारद्वाज 
स्वरचित

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