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बिखरते रिश्ते जज्बात कई दिल में छिपाये रहते हैं लोग, अपनों को ही गैरों के लिये छोड़ देते हैं लोग। थामा था दामन क्यूँ पल भर के लिये, क्यूँ दी खुशी पलक झपकाने तक भूल के सारी रस्म और  हया गैरों का दामन थाम लेते हैं लोग। आँसुओं की कोई कद्र नहीं करते, बीते सुनहरे पल वो याद नहीं करते डुबोकर अपनी ही किश्ती को, सवार औरों की किश्ती पर हो जाते हैं लोग। डॉ.रुपाली भारद्वाज
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सपन सजीला जीवन  जीवन जैसे खुशियों का  मेला, सुंदर सुंदर सपन सजीला। हर पल लगता खुशियों का डेरा, मंद मंद कोई हवा के जैसा। बादलों ने एक चित्र उकेरा, देखन को मन हुआ बावरा। निंद्रा से जागी तो हुआ सवेरा, कलरव की सुरमई तान ने घेरा। पनघट,पंछी,बादल जैसा, जीवन जैसे....... प्रभात की निकली शुभ बेला, स्वर्ण कणों ने डाला डेरा, पुष्पों पर मंडराता भंवरा, उनके मकरंद पर आकर ठहरा। दिन,दिनकर दिलदार के जैसा, जीवन जैसे........ डॉ.रुपाली भारद्वाज  स्वरचित
बार्बी और बस्ती माँ इस गली से नहीं गुजरा करो,मुझे ये छोटी सी बस्ती वाले रास्ते से गुजरना पसंद नहीं....कहते हुए बार्बी ने मुँह बनाया। माँ अक्सर टू व्हीलर  से उस रास्ते से निकला करती  थी। माँ ने बार्बी को समझाया- हमें इन लोगों से घृणा नहीं करनी चाहिये। ये लोग हमारे रोज़ मर्रा के कई कामों को अंजाम देते हैं  हमें इनके प्रति कम से कम सुहानुभूति का भाव रखना चाहिये। ऐसा  कहते ही अचानक गाड़ी के जोर से ब्रेक लगते है और बार्बी नीचे गिर जाती है वैसे चोट ज्यादा नहीं थी। घटना को देख कर आसपास के लोग इकठ्ठा हो जाते है बार्बी अपने आप में कुछ  खो जाती है। माँ गाड़ी आगे बढ़ाते हुए बोली -देखा बार्बी , जहां बड़ी कॉलोनी में लोगों के चेहरे ही दिखाई नहीं देते और किसी का किसी से कोई वास्ता नहीं होता वही ये लोग मदद  के लिये तत्पर होते है। अब बार्बी को ये बात अंदर तक समझ आ  रही थी। डॉ.रुपाली भारद्वाज 
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शिव आराध्य,देवों के देव फ़िर कैसे उन्हें मनाऊँ मैं पूजन,अर्चन,धूप,दीप करूँ फ़िर कैसे उन्हें रिझाऊ मैं बन जाऊँ गर गँगा मैया, अर्पण कर दूँ बन,जल की धार है सहज नहीं पर गंगा बनना, फ़िर कैसे उन्हें रिझाऊ मैं। बन जाऊँ गर गौरा मैया नित अर्पण कर दूँ जीवन पतवार है सहज नहीं पर गौरा बनना, फ़िर कैसे उन्हें रिझाऊ मैं। डॉ.रुपाली भरद्वाज

दीपक

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कभी दीपक बनूं, कभी बाती बनूं पर किसी की राह का काँटा न बनूं। जलाऊ प्यार की ज्योति दिल में, कभी दिलों को जलाने वाली आग न बनूं। दिखाऊ रास्ता सदा प्यार का, कभी दिल को दुखाने का कारण न बनूं। मिटाऊं आपसी बैर बीच का, कभी दुश्मनी का आगाज न  बनूं डॉ.रुपाली भारद्वाज

होली के रंग

ये मतवाले होली के रंग, खेले राधे कृष्ण के संग। प्रीत का रंग हुआ और गहरा, चारों तरफ़ गोपियों का पहरा। राधे बोली खेलत होली, मन को विचलित करती ये टोली। कृष्ण मंद मंद मुसकाये, गालों पर फ़िर रंग लगाये। शर्म हया से चमके गाल, होली ने तो किया कमाल। डॉ.रुपाली भारद्वाज