टूट कर संवरना

 फ़िर एक बार टूट कर

 बिखरना है मुझे,

नयी उड़ानो के लिये

सँवरना भी है मुझे।

आशाओं के दीप को 

आँधियों से बचा कर,

मंज़िल के आखिरी छोर पर, 

पहुँचना भी है मुझे।


डॉ.रुपाली भारद्वाज

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